May 28, 2026
राजीव रंजन शुक्ला

राजीव रंजन शुक्ला एक प्रतिष्ठित भूवैज्ञानिक, संवेदनशील साहित्यकार एवं प्रकृति-चिंतक हैं, जिन्होंने विज्ञान और साहित्य—दोनों क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। भूविज्ञान के क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले श्री शुक्ला ने बी.एससी. (ऑनर्स, जियोलॉजी) की डिग्री साइंस कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय से प्राप्त की तथा आईआईटी (आईएसएम), धनबाद से M.Sc. Tech (एप्लाइड जियोलॉजी) एवं M.Tech (पेट्रोलियम एक्सप्लोरेशन) की उपाधियाँ अर्जित कीं। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा उत्तीर्ण कर जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत केंद्रीय भूमिजल बोर्ड में भूजल वैज्ञानिक के रूप में अपने व्यावसायिक जीवन का प्रारंभ किया। अपने दीर्घ सेवाकाल में उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों में महत्वपूर्ण दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है।

श्री शुक्ला ने राजीव गांधी राष्ट्रीय भूमिजल प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, रायपुर (छत्तीसगढ़) में संकाय सदस्य एवं वरिष्ठ भूजल वैज्ञानिक के रूप में भी अपनी उल्लेखनीय सेवाएँ प्रदान की हैं। वर्तमान में वे केंद्रीय भूमिजल बोर्ड, मध्य पूर्वी क्षेत्र, पटना में क्षेत्रीय निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। भूजल, जल संरक्षण एवं पर्यावरणीय संतुलन जैसे विषयों पर उनकी गहरी समझ और व्यावहारिक अनुभव उन्हें अपने क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण विशेषज्ञ बनाते हैं।

लेखन के क्षेत्र में भी उनकी सक्रियता अत्यंत सराहनीय रही है। उनकी रचनाएँ विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं ई-समाचार मंचों पर नियमित रूप से प्रकाशित होती रही हैं। अब तक उनकी दो पुस्तकें— “आपातकाल में सृजन” (2020) तथा “आशा” (2023)— प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें पाठकों का भरपूर स्नेह एवं प्रशंसा प्राप्त हुई है। उनकी लेखनी संवेदनशील विचारों, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत है।

प्रकृति और पर्यावरण के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता ने उन्हें इस दिशा में लेखन के लिए प्रेरित किया। अपने कार्य क्षेत्र के भ्रमण के दौरान एक समाचार— “शुद्ध हवा बोतलों में बंद कर दिल्ली में बेची जा रही है”— ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। इसी अनुभव ने प्रकृति की मौन पुकार को सुनने और समाज तक पहुँचाने का संकल्प दिया। उनकी यह कृति केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि प्रकृति, जल, भूजल, नदियों, तालाबों, पेड़-पौधों और विलुप्त होती गौरैया जैसे विषयों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का एक गंभीर संदेश है। वे मानते हैं कि प्रकृति ने मानव को जीवन का हर आधार दिया है, इसलिए उसके संरक्षण का दायित्व भी हम सभी का है।

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