1. “जब शब्द डराए” — यह शीर्षक बहुत ही अनोखा है। इस नाम के पीछे क्या सोच या भावना थी?
उत्तर: ऐसी कुछ खास भावना नहीं थी। बचपन मे कुछ ऐसे शब्द सोचे थे और लिखे थे कि जिंदगी में आने वाले उन सामान्य शब्दों को लेकर कहानियां लिखी जाये तो? सामान्य लगने वाले शब्द भी डराने लगे तो कैसा लगेगा? वे शब्द जिनके बारे मे कभी आपने ध्यान भी नहीं दिया होता हैं। ये सोचते हुए मैंने ये किताब लिखी थी। मैंने मेरी किताब को देखते हुए 2 नाम सोचे थे- ‘शब्दों की डरावनी तस्वीरें’ और ‘जब शब्द डराए’। जिसमें से मैंने ‘जब शब्द डराए’ को चुना। जिंदगी में होने वाले सामान्य शब्द भी कैसे डराते हैं? यही सोचते हुए मैंने इसे लिखा हैं।
2. आपने कहा कि आप चाहती थीं कि पाठक इन शब्दों में डर को “महसूस” कर सके। आपके लिए डर का मतलब क्या है?
उत्तर: मेरे लिए डर का मतलब सिर्फ भूत-प्रेतों से ही नहीं हैं। जब मरने से या फिर छोटी-छोटी घटना से ही डर लगने लगता हैं। जैसे प्रकृति पर कुछ अनहोनी हुई हो। मुझे इस धरती के मिट जाने के सोच लेने भर से भी डर लगता हैं। कयी बार कयी बातें बहुत छोटी लेकिन, बहुत ही ज्यादा महसूस करने पर डराती हैं। जैसे डर को सोचने से डर लगता हैं।
3. जब आपने इस किताब को लिखना शुरू किया था, तब आपका सबसे बड़ा सपना क्या था?
उत्तर: मैंने इस किताब को बहुत बड़ा सपना सोचकर लिखा था, मैं चाहती थी कि मेरी किताब बहुत लोगों तक पहुंचे। बहुत लोग मुझे बताएं कि उन्हें मेरी किताब कैसी लगी। मैं मेरी किताब के बारे मे अच्छा बुरा सब कुछ जानना चाहती हूं। मेरा मकसद इस किताब से किसी को डराना ही नहीं हैं। सिर्फ मज़े के लिए इसे पढ़ सकते हैं। और लोगों के प्रति अपना नजरिया भी बदल सकते हैं। शायद कुछ रिश्ते बदल भी जाये इससे। डर जब जब मैंने करीब से देखा हैं, मैंने अपने आपको बदला हैं।
4. आपने किताब को अपनी बेटी के जन्म से पहले लिखा। माँ बनने के बाद क्या आपके लेखन के दृष्टिकोण में कोई बदलाव आया?
उत्तर: हाँ, प्रशवी के होने के बाद समय का मैनेजमेंट करना थोड़ा सा कठिन हुआ हैं। उसके होने के बाद एक बात जरूर मेरे दिमाग में आती हैं कि मैं उसे मुझ पर बहुत गर्व करवाना चाहती हूं। और मैं लोगों की सोच से लड़का लड़की के gender को लेकर जो सोच होती हैं उसे सभी के दिमाग से मिटाना चाहती हूं।
अगली किताब के बारे मे सोचते हुए, मुझे 3 महीने हो गए हैं। बस, सोचती ही जा रही हूं। हाँ, मुझे पता हैं कि समय तो निकालने से ही मिलता हैं। लेकिन प्रशवी अभी छोटी हैं तो मैं बिल्कुल भी अपनी किताब पर ध्यान नहीं दे पा रही। हो सकता हैं इसे लिखने में मुझे थोड़ा समय लगे।
हालांकि उसके होने के बाद मैं उससे प्रेरित होती हूं। उसे देखकर तो मुझे लिखने को लेकर ऊर्जा मिलती हैं। हालांकि मैं अभी उतना नहीं लिख पायी हूं उसके होने के बाद।
5. आपने ज़िक्र किया कि मानसिक स्थिति के कारण आप इसे वैसा नहीं बना पाईं जैसी चाहती थीं। उस दौर ने आपको एक लेखक के रूप में क्या सिखाया?
उत्तर: मैंने ये सपना 6th क्लास में ही देख लिया था। बस, पता नहीं था कि इसे पूरा कैसे करना था। शादी बाद स्थितियाँ बदली। सपने भी देखने को मिले। लेकिन, प्रशवी के होने के बाद मैं पोस्टमार्टम डिप्रेशन मे चली गई थी। खुद से सही होने का कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। 2024 मे ‘इंसानी नगरी’ को लोगों के सामने रखा। 2025 मे ‘जब शब्द डराए’ को रखा। ‘जब शब्द डराए’ किताब इस तरह से तैयार नहीं थी कि लोगों के सामने रखी जाये। लेकिन, मैं अपने आप से इतना तंग थी कि मैंने इसे पब्लिशर को सौंपा की वे इसे एडिट करके लोगों के सामने रखने लायक इसे बनाकर दे।
मैं खुद को ही बताना चाहती थी कि देखो तुम फालतू मे ही परेशान हो। तुम अपने आपको देखो एक बार। तुम जिस दिन खुद को देख पायी, तुम भी खुश हो जाओगी उस दिन।
मैं आगे भी यूँही लिखती रहूंगी। जिससे लोग मुझे पहचान सके।
6. डर और हकीकत — इन दोनों के बीच का रिश्ता आपने कैसे समझा और उसे शब्दों में कैसे पिरोया?
उत्तर: डर और हकीकत के बीच का रिश्ता ये बहुत ही अच्छा सवाल हैं। डर से तब ही डर सकते हैं, जब हम उससे डरे। मेरा मतलब हैं कि डर भी तभी डराता हैं जब हम उससे डरते हैं। डर एक सोच हैं उससे ज्यादा कुछ भी नहीं। और हकीकत वही जो बीत रहा हैं। सोच हमारी कुछ भी हो सकती हैं जैसे imagination कुछ भी हो सकती हैं। वो उतना नहीं डराती। लेकिन, हकीकत मामूली ही क्यूँ ना हो वो ज्यादा डराती हैं। क्यूंकि, वो हकीकत हैं।
डर एक ऐसा भाव हैं जो हकीकत मे एहसास किया जाये तो हमे बदल सकता हैं। मैंने डर को भूत-प्रेत के हिसाब से ही नहीं। बहुत करीब से इसे मैने जकड़ते हुए एहसास किया हैं। एक बार आप डर की गिरफ्त मे आ गए तो इससे निकलना मुश्किल होता हैं।
एक बार आप ही सोच कर बताना कि जब आपको पता लगता हैं की कोई डर की कहानी सच्ची और हकीकत हैं तो आपको डर लगता हैं। और पता लगे कि काल्पनिक हैं तो डरावनी होने पर भी उतने डर के भाव नहीं आते। लेकिन जब उस डर को हम अपने आपसे कनेक्ट करने लगते हैं तब डर बढ़ने लगता हैं। लाइफ के कॉमन वर्ड हमसे कनेक्ट होते हैं। शायद, इसलिए वो हमे डरा पाए।
7. इस किताब को लिखते हुए कौन-सा पल सबसे कठिन था, और कौन-सा सबसे सुकून देने वाला?
उत्तर: इस किताब को लिखते हुए सबसे कठिन पल मुझे अच्छे से याद हैं कि जब मैं इन टाइटल पर लिखने से पहले रिसर्च करती थी- कुछ मूवीज देखकर और कुछ पढ़कर तब मैं उस सोच में इतना डूबी थी कि मेरा नेचर disturbing हो गया था। कुछ चीजें कयी बार बहुत परेशान करने लगती हैं। प्रशांत ने मुझे जब देखा कि मैं बहुत अलग और अजीब व्यवहार करने लगी हूं तो उन्होंने मुझे सब कुछ एक बार छोड़ने के लिए suggest किया था। कुछ समय के लिए मैं इन सभी से थोड़ा दूर भी रही।
सुकून देने वाला पल हमेशा एक जरूर रहा था। 42 टाइटल मैं जब 9th क्लास में थी तभी से लिखे हुए थे। हालांकि, किताब मे 50 कहानियाँ हैं। उन्हें जब भी पढ़ती थी या फिर देखती थी या फिर हर ईयर की नयी डायरी बनने पर उसमे जब ये टाइटल लिखती थी। एक लंबी साँस खींचती थी तो मन मे इतनी शांति मिलती थी कि कभी इन पर मैं किताब लिखूँगी। जो शायद दुनिया भर मे किसी के भी हाथ लगेगी तो मुझे सराहना मिलेगी। मैं आशा करती हूं कि ऐसा जरूर हो कि लोगों को मेरी किताब पसंद आए।
8. आपके अनुसार “डर” सिर्फ कहानी का विषय है या यह जीवन का भी एक अनुभव है जिसे हर इंसान को महसूस करना चाहिए?
उत्तर: डर कहानी का विषय भी हैं तो जीवन का अनुभव भी। जब हम आगे बढ़ने के लिए मन से डर को निकाल कर फेंक देते हैं तो जिंदगी में हम बहुत आगे बढ़ जाते हैं। डर सिर्फ और सिर्फ एक एहसास हैं और कुछ भी नहीं। इस एहसास मे ही इतना दम है कि ये हमे बहुत जगह रोकता हैं।
डर तो सभी ने ही एक ना एक बार जरूर एहसास किया ही होगा। ये हमारी फीलिंग्स का ही हिस्सा हैं। मुझे सबसे ज्यादा डर इस दुनिया के मेरे सामने खतम होने की सोच भर से बहुत डर लगता हैं।
डर को पॉजिटिव वे मे ले तो ये अनुभव के साथ जिंदगी को जानने का मौका भी देता हैं। हाँ, जब कभी अजनबी चीजें बीतती हैं तो डर मन को घेरने लगता हैं और एहसास होता हैं उस डर का जिससे हम भागते रहते हैं।
9. जो पाठक “जब शब्द डराए” पढ़ने जा रहे हैं, उनसे आप क्या उम्मीद रखती हैं?
उत्तर: मुझे यही उम्मीद हैं कि मेरे पाठक इसे सिर्फ फन के रूप मे लेके पढ़े। ये किताब उन लोगों के लिए हैं जो लंबी किताब लंबा टाइम देकर नहीं पढ़ सकते। छोटे छोटे किस्सों को पढ़कर खुद की यादें भी ताजा कर सकते हैं। डर थोड़ा भी मन मे पनप जाये तो समझना कहानियाँ समझ मे आने लगी हैं। हाँ, एक बात जरूर कहनी हैं कि इन कहानियों का सच से कोई वास्ता नहीं हैं। क्यूंकि, डर सिर्फ कल्पना मे हैं, सच मे नही।
10. अगर आपको इस किताब को एक वाक्य में परिभाषित करना हो — तो आप क्या कहेंगी?
उत्तर: सामान्य जिंदगी की सामान्य चीजें भी सामान्य शब्दों मे आपको डरा सकती हैं। क्यूंकि, जब शब्द डराए।
लेखिका: करिश्मा अग्रवाल
पुस्तक का नाम: जब शब्द डराए

